Friday, February 19, 2010

श्री साईं बाबा के ग्यारह वचन

जो शिरडी में आयेगा, आपद दूर भगाएगा ।। 1 ।।

चढे समाधि की सीढ़ी पर, पैर तले दुःख की पीढ़ी पर ।। 2 ।।

त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त-हेतु दौड़ा आऊंगा ।। 3 ।।

मन में रखना दृढ़ विश्वास, करें समाधि पूरी आस ।। 4 ।।

मुझे सदा जीवित ही जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो ।। 5 ।।

मेरी शरण आ खाली जाये, हो तो कोई मुझे बताये ।। 6 ।।

जैसा भाव रहा जिस जन का, वैसा रुप हुआ मेरे मन का ।। 7 ।।

भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा ।। 8 ।।

आ सहायता लो भरपूर, जो मांगा वह नही हैं दूर ।। 9 ।।

मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया ।। 10 ।।

धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य ।। 11 ।।

Thursday, February 18, 2010

Ankit agrawal dankaur

नज़र हटती ही नहीं

हम तो उनकी बातो को सुनते थे बस उही गोर से
हमको कहा पता था की ये शरुआत है प्यार की
अब तो हालात ऐसे है की उनसे नज़र हटती ही नहीं
वो हमसे इतने खफा की हमारी ओर देखते ही नहीं
written by- ankit agrawal

Friday, February 12, 2010

Dankaur

पिछली शताब्‍दी के आरंभ में बाघों की आबादी करीब 40 हजार थी। अब उनमें से केवल 1411 भारत में बाकी बचे हैं। पिछले वर्ष भारत में 86 बाघों की जान गई। भारत में करीब 37 बाघ अभयारण्‍य हैं लेकिन इनमें से करीब 17 अब अपनी बाघों की आबादी को पूरी तरह खो चुकी हैं या खोने की कगार पर हैं।

क्‍या ये तथ्‍य भयावह नहीं लगते। बाघों की लगातार खत्‍म होती आबादी के कारण अब उनके अस्तित्‍व पर संकट मंडरा रहा है। इसलिए अब बाघों को बचाने की बात शुरू हो रही हैं। बाघों को बचाने और उनकी आबादी को बढ़ाने की कवायद शुरू हो रही है। दुनिया भर के पशु प्रेमी इस मुहिम में अपनी भूमिका निभाने को तैयार हो रहे हैं।

बाघों को बचाने की इस मुहिम का हिस्‍सा बनिए।

Motivation

1.हिम्मत से सच कहूँ तो बुरा मानते हैं लोग ,
रो - रो कर बात कहने की आदत नहीं रही||



2.जज़्बा कोई अख़लाक से बेहतर नहीं होता।
कुछ भी यहां इंसान से बढ़कर नहीं होता।
कोशिश से ही इंसान को मिलती है मंजिलें,
मुट्ठी में कभी बंद मुक़द्दर नहीं होता।

Thursday, February 11, 2010

क्या करोगे तुम?(मेरी जिंदगी का पहला खुद का लेख)

मुझे पढो तो ज़रा अहतियात से पढना क्योकि
वक़्त वो भी अजीब था जब तू मेरे करीब था.........

यादों की डगर में जब हो आशियाना हमारा
फूलो की ख़ुश्बू की तरह रहना सांसो मे हमारी........

रात के सन्नाटों में जब कोई दर्द छेड़े तराना
जब बुरा लगने लगे तुमको ये सारा जमाना.......

ख़ामोशियों की वो धीमी सी आवाज़ में सुनाना
लिखा है जिस गजल को इंतज़ार में मेरी.........

हर तरफ है दरिन्दे दुनिया में यू तो बस अब
मिले फिर भी कोई तुम्हे मुज जैसा तो........

लिखा है जिस गजल को इंतज़ार में मेरी
बस वही गजल आ के मुझे सुना जाना........

ज़िन्दगी प्यारी सही लेकिन हमे मरना तो है.......
फिर यादे सताएगी तुमको हमारी, रूह बनकर

क्या करोगे तब तुम उस ग़ज़ल के पन्नो का
लिखा है जिस गजल को इंतज़ार में मेरी...........
by- ankit agrawal

सपने सच होते रहगे

कहीं किसी शहर में एक छोटा लड़का रहता था. उसके पिता एक अस्तबल में काम करते थे. लड़का रोजाना देखता था कि उसके पिता दिन-रात घोड़ों की सेवा में खटते रहते हैं जबकि घोड़ों के रैंच का मालिक आलीशान तरीके से ज़िंदगी बिताता है और खूब मान-सम्मान पाता है. यह सब देखकर लड़के ने यह सपना देखना शुरू कर दिया कि एक दिन उसका भी एक बहुत बड़ा रैंच होगा जिसमें सैंकड़ों बेहतरीन घोड़े पाले और प्रशिक्षित किये जायेंगे.

दिन लड़के के स्कूल में सभी विद्यार्थियों से यह निबंध लिखने के लिए कहा गया कि ‘वे बड़े होकर क्या बनना और करना चाहते हैं’. लड़के ने रात में जागकर बड़ी मेहनत करके खूब लंबा निबंध लिखा जिसमें उसने बताया कि वह बड़ा होकर घोड़ों के रैंच का मालिक बनेगा. उसने अपने सपने को पूरे विस्तार से लिखा और 200 एकड़ के रैंच की एक तस्वीर भी खींची जिसमें उसने सभी इमारतों, अस्तबलों, और रेसिंग ट्रैक की तस्वीर बनाई. उसने अपने लिए एक बहुत बड़े घर का खाका भी खींचा जिसे वह अपने रैंच में बनाना चाहता था.

लड़के ने उस निबंध में अपना दिल खोलकर रख दिया और अगले दिन शिक्षक को वह निबंध थमा दिया. तीन दिन बाद सभी विद्यार्थियों को अपनी कापियां वापस मिल गयीं. लड़के के निबंध का परिणाम बड़े से लाल शब्द से ‘फेल’ लिखा हुआ था. लड़का अपनी कॉपी लेकर शिक्षक से मिलने गया. उसने पूछा – “आपने मुझे फेल क्यो किया?” – शिक्षक ने कहा – “तुम्हारा सपना मनगढ़ंत है और इसके साकार होने की कोई संभावना नहीं है. घोड़ों के रैंच का मालिक बनने के लिए बहुत पैसों की जरुरत होती है. तुम्हारे पिता तो खुद एक साईस हैं और तुम लोगों के पास कुछ भी नहीं है. बेहतर होता यदि तुम कोई छोटा-मोटा काम करने के बारे में लिखते. मैं तुम्हें एक मौका और दे सकता हूँ. तुम इस निबंध को दोबारा लिख दो और कोई वास्तविक लक्ष्य बना लो तो मैं तुम्हारे ग्रेड पर दोबारा विचार कर सकता हूँ”.

वह लड़का घर चला गया और पूरी रात वह यह सब सोचकर सो न सका. बहुत विचार करने के बाद उसने शिक्षक को वही निबंध ज्यों-का-त्यों दे दिया और कहा – “आप अपने ‘फेल’ को कायम रखें और मैं अपने सपने को कायम रखूंगा”.

बीस साल बाद शिक्षक को एक घुड़दौड़ का एक अंतर्राष्ट्रीय मुकाबला देखने का अवसर मिला. दौड़ ख़त्म हुई तो एक वयक्ति ने आकर शिक्षक को आदरपूर्वक अपना परिचय दिया. घुड़दौड़ की दुनिया में एक बड़ा नाम बनचुका यह वयक्ति वही छोटा लड़का था जिसने अपना सपना पूरा कर लिया था.

कहते हैं यह एक सच्ची कहानी है. होगी. न भी हो तो क्या! असल बात तो यह है कि हमें किसी को अपना सपना चुराने नहीं देना है और न ही किसी के सपने की अवहेलना करनी है. हमेशा अपने दिल की सुनना है, कहनेवाले कुछ भी कहते रहें. खुली आंखों से जो सपने देखा करते हैं उनके सपने पूरे होते हैं.

अच्छा और बुरा गुलाम

एक बादशाह ने दो गुलाम सस्ते दाम में खरीदे. उसने पहले से बातचीत की तो वह गुलाम बड़ा बुद्धिमान और मीठा बोलने वाला मालूम हुआ. जब होंठ ही मिठास के बने हुए हों तो उनमें से शरबत के सिवाय और क्या निकलेगा? मनुष्य की मनुष्यता उसकी वाणी में भरी हुई ही तो है. बादशाह जब इस गुलाम की परीक्षा कर चुका तो उसने दूसरे को पास बुलाकर देखा तो पाया कि यह बहुत बदसूरत और गंदा है. बादशाह इसके चेहरे को देखकर खुश नहीं हुआ परन्तु उसकी योग्यता और गुणों की जांच करने लगा. पहले गुलाम को उसने नहा-धोकर आने के लिए कह दिया और दूसरे से कहा – “तुम अपने बारे में कुछ बताओ. तुम अकेले ही सौ गुलामों के बराबर हो. तुम्हें देखकर उन बातों पर यकीन नहीं होता जो तुम्हारे साथी ने तुम्हारे पीठपीछे कही हैं.”

गंदे गुलाम ने जवाब दिया – “उसने यदि मेरे बारे में कुछ कहा है तो सच ही कहा होगा. यह बड़ा सच्चा आदमी है. इससे ज्यादा भला आदमी मैंने और कोई नहीं देखा. यह हमेशा सच बोलता है. यह स्वभाव से ही सत्यवादी है इसलिए इसने जो मेरे संबंध में कहा है यदि वैसा ही मैं इसके बारे में कहूं तो झूठा दोष लगाना होगा. मैं इस भले आदमी की बुराई नहीं करुंगा. इससे तो यही अच्छा है कि मैं खुद को दोषी मान लूं. बादशाह सलामत, हो सकता है कि वह मुझमें जो ऐब देखता हैं वह मुझे खुद न दीखते हों।”

बादशाह ने कहा – “मैं तो चाहता हूं कि तुम भी इसकी कमियों का वैसा ही बखान करो जैसा इसने तुम्हारी कमियों का किया है जिससे मुझे इस बात का यकीन हो जाये कि तुम मेरी खुशी और सलामती चाहते हो और मुल्क को चलाने में मेरे काम आ सकते हो.”

गुलाम बोला – “बादशाह सलामत, इस गुलाम में सादगी और सच्चाई है. बहादुरी और बड़प्पन भी ऐसा है कि मौका पड़ने पर जान तक न्यौछावर कर सकता है। वह घमंडी नहीं है और अपनी गलतियों को खुद ही ज़ाहिर कर देता है. अपनी गलतियों को सामने लाना और ऐब ढूंढना हालांकि बुरा है तो भी वह दूसरे लोगों के लिए तो अच्छा ही है.”

बादशाह ने कहा – “अपने साथी की तारीफ़ में अति न करो और दूसरे की तारीफ़ करके खुद को तारीफ़ के काबिल नहीं बनाओ क्योंकि यदि मैंने तुम्हारा इम्तिहान लेने के लिए इसे बुला लिया तो तुम्हें शर्मिंदा होना पड़ेगा.”

गुलाम ने कहा – “नहीं, मेरे साथी की अच्छाइयां इससे भी सौ गुना हैं. जो कुछ मैं अपने दोस्त के बारे के संबंध में जानता हूं यदि आपको उसपर यकीन नहीं तो मैं और क्या अरज करूं!”

इस तरह बहुत सी बातें करके बादशाह ने उस बदसूरत गुलाम की अच्छी तरह परीक्षा कर ली और जब पहला गुलाम स्नान करके बाहर आया तो उसको अपने पास बुलाया. बदसूरत गुलाम को वहां से विदा कर दिया. उस सुंदर गुलाम के रूप और गुणों की प्रशंसा करके कहा – “पता नहीं, तुम्हारे साथी को क्या हो गया था कि इसने पीठ-पीछे तेरी खूब बुराई की!”

सुंदर गुलाम ने चिढ़कर कहा – “बादशाह सलामत, इस नामुराद ने मेरे बारे में जो कुछ कहा उसे ज़रा तफ़सील से मुझे बताइये.”

बादशाह ने कहा – “सबसे पहले इसने तुम्हारे दोगलेपन का जिक्र किया कि तुम सामने तो दवा हो लेकिन पीठ-पीछे दर्द हो.”

जब इसने बादशाह के मुंह से ये शब्द सुने तो इसका पारा चढ़ गया, चेहरा तमतमाने लगा और अपने साथी बारे में उसके मुंह में जो आया वह बकने लगा. वह बदसूरत गुलाम की बुराइयां करता ही चला गया तो बादशाह ने इसके होंठों पर हाथ रख दिया और कहा – “बस करो, हद हो गयी. उसका तो सिर्फ बदन ही गंदा है लेकिन तुम्हारी तो रूह भी गंदी है. तुम्हारे लिए तो यही मुनासिब है कि तुम उसकी गुलामी करो.”

[याद रखो, सुन्दर और लुभावना रूप होते हुए भी यदि मनुष्य में अवगुण हैं तो उसका मान नहीं हो सकता। और यदि रूप बुरा पर चरित्र अच्छा है तो उस मनुष्य के चरणों में बैठकर प्राण विसर्जन कर देना भी श्रेष्ठ है।]

जलालुद्दीन रूमी की किताब ‘मसनवी’ से लिया गया अंश.

चोर बादशहा का इन्साफ

गज़नी के बादशाह का नियम था कि वह रात को भेष बदलकर गज़नी की गलियों में घूमा करता था. एक रात उसे कुछ आदमी छुपते-छुपाते चलते दिखाई दिये. वह भी उनकी तरफ बढ़ा. चोरों ने उसे देखा तो वे ठहर गये और उससे पूछने लगे – “भाई, तुम कौन हो और रात के समय किसलिए घूम रहे हो?” बादशाह ने कहा – “मैं भी तुम्हारा भाई हूं और रोज़ी की तलाश में निकला हूं.” यह सुनकर चोर बड़े खुश हुए और कहने लगे – “यह बहुत अच्छा हुआ जो तुम हमसे आ मिले. जितने ज्यादा हों, उतनी ही ज्यादा कामयाबी मिलती है. चलो, किसी बड़े आसामी के घर चोरी करें”. जब वे लोग चलने लगे तो उनमें से एक ने कहा, “पहले यह तय कर लेना चाहिए कि कौन आदमी किस काम को अच्छी तरह कर सकता है, जिससे हम एक-दूसरे के हुनर को जान जाएं और जो ज्यादा हुनरमंद हो उसे नेता बनायें”.

यह सुनकर हर एक ने अपनी-अपनी खूबियां बतलायीं. एक बोला – “मैं कुत्तों की बोली पहचानता हूं. वे जो कुछ कहें, उसे मैं अच्छी तरह समझ लेता हूं. हमारे काम में कुत्तों से बड़ी अड़चन पड़ती है. हम यदि उनकी बोली जान लें तो हमारा ख़तरा कम हो सकता है और मैं इस काम को बड़ी अच्छी तरह कर सकता हूं”.

दूसरा कहने लगा – “मेरी आंखों में ऐसी ताकत है कि जिसे अंधेरे में देख लूं, उसे फिर कभी नहीं भूल सकता. और दिन के देखे को अंधेरी रात में पहचान सकता हूं. बहुत से लोग हमें पहचानकर पकड़वा देते हैं. मैं ऐसे लोगों को तुरन्त भांप लेता हूं और अपने साथियों को सावधान कर देता हूं. इस तरह हमारी हिफ़ाज़त हो जाती है”.

तीसरा बोला – “मुझमें ऐसी ताकत है कि मज़बूत दीवार में सेंध लगा सकता हूं और यह काम मैं ऐसी फुर्ती और सफाई से करता हूं कि सोनेवालों की आंखें नहीं खुलतीं और घण्टों का काम पलों में हो जाता है”.

चौथा बोला – “मेरी सूंघने की ताकत इतनी खास है कि ज़मीन में गड़े हुए धन को वहां की मिट्टी सूंघकर ही बता सकता हूं. मैंने इस काम में इतनी कामयाबी पाई है कि मेरे दुश्मन भी मेरी बड़ाई करते हैं. लोग अमूमन धन को धरती में ही गाड़कर रखते हैं. इस वक्त यह हुनर बड़ा काम देता है. मैं इस इल्म का पूरा जानकार हूं. मेरे लिए यह काम बड़ा आसान है”.

पांचवे ने कहा – “मेरे हाथों में ऐसी ताकत है कि ऊंचे-ऊंचे महलों पर बिना सीढ़ी के चढ़ सकता हूं और ऊपर पहुंचकर अपने साथियों को भी चढ़ा सकता हूं. तुममें तो कोई ऐसा नहीं होगा, जो यह काम कर सके।”

इस तरह जब सब लोग अपने-अपने हुनर बता चुके तो नये चोर से बोले – “तुम भी अपना कमाल बताओ, जिससे हमें अन्दाज हो कि तुम हमारे काम में कितने मददगार हो सकते हो”. बादशाह ने जब यह सुना तो खुश हो कर कहने लगा – “मुझमें ऐसा इल्म है, जो तुममें से किसी में भी नहीं है. और वह इल्म यह है कि मैं गुनाहों को माफ़ कर सकता हूं. अगर हम लोग चोरी करते पकड़े जायें तो अवश्य सजा पायेंगे लेकिन मेरी दाढ़ी में यह खूबी है कि उसके हिलते ही सारे गुनाह माफ़ हो जाते हैं. तुम चोरी करके भी साफ बच सकते हो. देखो, कितनी बड़ी ताकत है मेरी दाढ़ी में.”

बादशाह की यह बात सुनकर सबने एक सुर में कहा – “भाई तू ही हमारा नेता है. हम सब तेरी ही इशारों पर काम करेंगे ताकि अगर कहीं पकड़े जायें तो बख्शे जा सकें. ये हमारी खुशकिस्मती है कि तुझ-जैसा हुनरमंद साथी हमें मिला”.

इस तरह मशवरा करके ये लोग वहां से चले. जब बादशाह के महल के पास पहुंचे तो कुत्ता भूंका. चोर ने कुत्ते की बोली पहचानकर साथियों से कहा कि यह कह रहा है कि बादशाह पास ही हैं इसलिए होशियार होकर चलना चाहिए. मगर उसकी बात किसीने नहीं मानी. जब नेता आगे बढ़ता चला गया तो दूसरों ने भी उसके संकेत की कोई परवाह नहीं की. बादशाह के महल के नीचे पहुंचकर सब रुक गये और वहीं चोरी करने का इरादा किया. दूसरा चोर उछलकर महल पर चढ़ गया और फिर उसने बाकी चोरों को भी खींच लिया. महल के भीतर घुसकर सेंध लगायी गई और खूब लूट हुई. जिसके जो हाथ लगा, समेटता गया. जब लूट चुके तो चलने की तैयारी हुई. जल्दी-जल्दी नीचे उतरे और अपना-अपना रास्ता लिया. बादशाह ने सबका नाम-धाम पूछ लिया था. चोर माल-असबाब लेकर चंपत हो गये.

बादशाह ने अपने मंत्री को आज्ञा दी कि तुम अमुक स्थान में तुरन्त सिपाही भेजो और फलां-फलां लोगों को गिरफ्तार करके मेरे सामने हाजिर करो. मंत्री ने फौरन सिपाही भेज दिये. चोर पकड़े गये और बादशाह के सामने पेश किये गए. जब इन लोगों ने बादशाह को देखा तो एक-दूसरे से कहा – “बड़ा गजब हो गया! रात चोरी में बादशाह हमारे साथ था.” और यह वही नया चोर था, जिसने कहा था कि “मेरी दाढ़ी में वह शक्ति है कि उसके हिलते ही अपराध क्षमा हो जाते हैं।”

सब लोग साहस करके आगे बढ़े और बादशाह के सामने सज़दा किया. बादशाह ने उनसे पूछा – “तुमने चोरी की है?”

सबने एक साथ जवाब दिया – “हां, हूजर. यह अपराध हमसे ही हुआ है।”

बादशाह ने पूछा – “तुम लोग कितने थे?”

चोरों ने कहा – “हम कुल छ: थे।”

बादशाह ने पूछा – “छठा कहां है?”

चोरों ने कहा – “अन्नदाता, गुस्ताखी माफ हो। छठे आप ही थे।”

चोरों की यह बात सुनकर सब दरबारी अचंभे में रह गये. इतने में बादशाह ने चोरों से फिर पूछा – “अच्छा, अब तुम क्या चाहते हो?”

चोरों ने कहा – “अन्नदाता, हममें से हर एक ने अपना-अपना काम कर दिखाया. अब छठे की बारी है. अब आप अपना हुनर दिखायें, जिससे हम अपराधियों की जान बचे।”

यह सुनकर बादशाह मुस्कराया और बोला – “अच्छा! तुमको माफ किया जाता है. आगे से ऐसा काम मत करना”.

जलालुद्दीन रूमी की किताब मसनवी से ली गई कहानी.