1.हिम्मत से सच कहूँ तो बुरा मानते हैं लोग ,
रो - रो कर बात कहने की आदत नहीं रही||
2.जज़्बा कोई अख़लाक से बेहतर नहीं होता।
कुछ भी यहां इंसान से बढ़कर नहीं होता।
कोशिश से ही इंसान को मिलती है मंजिलें,
मुट्ठी में कभी बंद मुक़द्दर नहीं होता।
रो - रो कर बात कहने की आदत नहीं रही||
2.जज़्बा कोई अख़लाक से बेहतर नहीं होता।
कुछ भी यहां इंसान से बढ़कर नहीं होता।
कोशिश से ही इंसान को मिलती है मंजिलें,
मुट्ठी में कभी बंद मुक़द्दर नहीं होता।

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